११२. मेरा कोहिनूर *
बातें साथ निभाने की थी, वक्त को आजमाने की थी, एक दूजे का हौंसला बढ़ाने की थी, रूठी क़िस्मत को मनाने की थी... फ़िर ना जाने क्यों हम मजबूर हुए, आँखो से ओझल, जिंदगी से दूर हुए, अब यह दूरी बहुत तड़पाने लगी है, तेरे बिन हर खुशियां चिढ़ाने लगी हैं... खुशियों की लुका छिपी नई बात नहीं है, तेरी याद न आई ऐसा दिन-रात नहीं है, लोगों का आना-जाना लगा हीं रहता है, दिल को सुकून दे, ऐसी कोई मुलाकात नहीं है ... अल्हड़ थी फ़िर भी तुम्हें सबकी परवाह थी, डूबती कश्ती पर सवार होकर भी लापरवाह थी, तेरी प्रेरणा ने जीवन में दीपक जलाया था, तेरी यादों ने कितना पागल बनाया था ... मेरी ख़ामोशी को भी पढ़ना आता था, मुस्कुराहट वाली कहानी गढ़ना आता था, रिश्तों को जोड़कर ऊंचाई चढ़ना आता था, तेरे संग जीना और मरना चाहता था ... अब ख़ुश होगी, मैंने तुम्हें तो छोड़ दिया है, मुस्कुराहट ने मेरा साथ छोड़ दिया है, वक्त ने न जाने क्यों मुझे इतना मजबूर किया है, हीरा में उलझा कर मुझसे मेरा कोहिनूर दूर किया है ...