१०८. तेरा साथ * (काव्यंजली)

तेरा साथ

✍ बिपिन कुमार चौधरी


दुनियाँ के इस मेला में,
प्रिय तेरे बिन अकेला मैं,
तुम्हारे मुस्कान की तलाश कर रहा हूँ,
रब से तेरे हीं साथ का मांग कर रहा हूँ ....

तेरे नयनों के इस नीड़ में,
विचलित मेरा मन गंभीर मैं,
सुकून के उन लम्हों का तलाश कर रहा हूँ,
रब से तेरे हीं साथ का मांग कर रहा हूँ ....

तम से घिरे साग़र में,
बहुत ख़ुश हूँ तुझे पाकर मैं,
तेरी खुशियों के लिये विलाप कर रहा हूँ,
रब से तेरे हीं साथ का मांग कर रहा हूँ ....

आमवश्या की विलुप्त निशाकर में,
नई उषा की बेला औऱ दिवाकर मैं,
शशि की भाँति ओझल होने का स्वांग कर रहा हूँ,
रब से तेरे हीं साथ का मांग कर रहा हूँ ....

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