११०. इश्क़ ए बेवफ़ा *

इश्क़ ए बेवफ़ा

✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी

किसी की चाहत में मैं दुनियाँ को भूल गया,
इसी दुनियाँ के लिये कोई मुझको भूल गया,
तुझे याद करने की मुझे मिल रही सजा,
तेरे गुनाहों का महल तेरी ही बेवफ़ाई से धूल गया ...
किसी की चाहत में मैं दुनियाँ को भूल गया ...

तेरी रुसवाइयों का मुझे बहुत ग़म है,
एक बेवफ़ा से मोहब्बत की सजा कम है,
परछाईं मानकर एतबार किया जिसपर ख़ुद से ज्यादा,
सतरंगी दुनियाँ की छटा में मैंने उसे बहुत दूर पाया,
तेरी गुनाहों का महल तेरी बेवफ़ाई से धूल गया,
किसी की चाहत में मैं दुनियाँ को भूल गया ...

इन ख़ूबसूरत आखों के अश्कों की मोतियों को संभालो,
मेरी ग़लती बता दो फ़िर चाहे मुझे दिल से निकालो,
तेरी इन हरकतों से मेरा दिल टूट गया,
तेरे ही लबों के तब्बसुम की ख़ातिर मेरा जिंदगी लूट गया,
तेरे गुनाहों का महल तेरी एक बेवफ़ाई से धूल गया,
किसी की चाहत में मैं दुनियाँ को भूल गया ...

अपने ख़ूबसूरत चेहरे को यूं मत छिपाओ,
जिसके लिये कभी सजती थी,उसी से यूं नजरें नहीं चुराओ,
तेरे ख्यालों में आज भी यह दिल तन्हा है,
आख़िर क्या गलती मुझसे हुई यह भी बताओ,
तेरे गुनाहों का महल तेरी एक बेवफ़ाई से धूल गया,
किसी की चाहत में मैं दुनियाँ को भूल गया ...

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