११४. लापता तब्बसुम *

लापता तब्बसुम

✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी

सुना है आजकल कोई बहुत गुमसुम है,
किसी के नजरों से गिड़ कर होठों से ग़ायब तब्बसुम है,
इसी तब्बसुम की ख़ातिर किसी  का दिल धड़कता था,
किसी के जिंदगी में तूफ़ान लाकर आजकल कोई गुमसुम है ...

अख़बार में क्या ख़ूब ख़बर छपी है,
अफ़साना जगजाहिर हक्कीकत दबी है,
फ़िर भी उसकी गलियों में किस बात की धूम है,
किसी के जिंदगी में तूफ़ान लाकर आजकल कोई गुमसुम है ...

तुझे तेरे हीं आंखो के अश्कों की कसम है,
मत छिपा जां से भी ज्यादा चाहने वाला तेरा एक सनम है,
तेरा मोहब्बत तेरी वफ़ा से मरहूम है,
किसी की जिंदगी में तूफ़ान लाकर आजकल कोई गुमसुम है...

तेरी परछाईं भी तुझसे चीख़-चीख़ कर कह रही है,
मेरे जैसा तुझे चाहने वाला इस जहाँ में कोई नहीं है,
प्यार के जन्नत से प्यारा किसी को जहन्नुम है,
किसी की जिंदगी में तूफ़ान लाकर आजकल कोई गुमसुम है ...

अपने  लबों को इतना तकलीफ़ क्यों देती हो,
तेरा दिल कुछ और चाहे, जुबां से कुछ और कहती हो,
आख़िर किन मजबूरियों ने किया लापता तेरा तबस्सुम है,
किसी की जिंदगी में तूफ़ान लाकर आजकल कोई गुमसुम है ....

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