११५. शर्त ए मोहब्बत *

शर्त ए मोहब्बत

✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी

तुम्हें मुझसे मोहब्बत है,
मैं भी तेरी मोहब्बत से अनजान नहीं,
बेशक तेरी मोहब्बत की गिरफ्त में हूँ,
तेरी शर्तों का कोई गुलाम नहीं...

दिल की गहराई में कभी उतर कर देखो,
इश्क़ के पावन दिये मैंने भी जलाये हैं,
मेरी मजबूरियों की यह इंतहा है,
अपनी इश्क़ तेरे तोहमत की आग में जलाये हैं...

शर्तों की गलियों में प्यार नहीं होता है,
इश्क़ की वादियों में व्यापार नहीं होता है,
तोहमत की दरिया बीच इश्क़ का इजहार नहीं होता है,
हमें समंदर में गोता लगाने की जिद्द है,
झीलों में ऐसा बहार नहीं होता है,
शर्तों की दुनियाँ से कभी बाहर आओ,
मोहब्बत की दुनियाँ से खुशनुमा संसार नहीं होता है....

रास्ते कठिन है, नामुमकिन नहीं,
शर्तों की ग़ुलामी को कोई मजबूर करे,
ऐसी मेरी कोई ग़लती नहीं,
ऐसा मैं कोई मुजरिम नहीं,
बेशक सुधा की तलाश मुझे है,
कोई प्यासा नहीं रहे, जहाँ में ऐसा मुमकिन नहीं ....

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