१०६. आख़री चाहत *
आख़री चाहत...
✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी
तुने सिर्फ़ मुझको खोया है,
मैंने ख़ुद को भी खोया है,
बेवफ़ा बोल कर तुम ख़ुश हो,
इसलिए आंसुओं को छिपा कर मेरा दिल रोया है ...
मैं एक बंजारे की तरह जी लूंगा,
गमों का जाम भी हंस कर पी लूंगा,
तेरी यादों की जन्नत भी इतनी खुशनुमा है,
इसी जन्नत में भटक कर तन्हा भी जी लूंगा ...
सुनहरे सपने दिखाने की रब की आदत है,
इसलिए मुझे उनसे भी बहुत शिक़ायत है,
मेरा माखौल उड़ा कर अपनी दुनियाँ में ख़ुश रहना,
अपने रब से यही मेरी आख़री चाहत है ...

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