१११. यूं आंखो को छलकाया न करो... *

यूं आंखो को छलकाया न करो...

✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी

आंखें खोल कर मैं ले रहा था अंगड़ाई,
सपनों में तेरे यादों की बारात थी आई,
इल्ज़ामों की तूने क्या झड़ी थी लगाई,
तेरे इल्ज़ामों का सिला मुझे मिली तनहाई...

मेरी क़िस्मत में शायद तेरा साथ नहीं था,
तुझे अपना बना सकूं वो हालात नहीं था,
पूरी लाइब्रेरी दिलोजान से मैं झक माड़ता रहा,
मेरी उलझनों को सुलझा दे वो किताब नहीं था...

सपनों में आकर उलझनें बढ़ाया न करो,
गिरेबान में हाथ डाल नजरें मिलाया न करो,
मेरी हसरतों को वक्त ने कब्र में दफन कर डाला है,
इजहारे इल्ज़ाम से मेरी वफ़ा को शरमाया न करो...

तेरी नज़रों में अगर मैं गुनाहगार हूं,
सजा मुक्कद्दर ने मुक्कमल दिया है मुझे,
अपनी सतरंगी दुनियां में मुझे बुलाया न करो,
मेरे सपनों में आकर यूं आंखो को छलकाया न करो...

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